Saturday, August 20, 2011

विदेह ई-पत्रिकाक ७७म अंक जे नारी विशेषांक छल, अपनामे एकटा अध्याय छल/ डॉ शेफालिका वर्मा

विदेह ई-पत्रिकाक ७७म अंक जे नारी विशेषांक छल, अपनामे एकटा अध्याय छल, ओइ अंकसँ किछु रचना आ चर्चा साभार दऽ रहल छी: ......

डॉ शेफालिका वर्मा
हम आबि रहल छी.. ........
माँ !
अहाँ किएक कानि रहल छी
कोन सोच में डूबल छी
शक्ति रहितो अशक्त बनल छी
हम सबटा जनैत छी
सबटा बूझैत छी .................
अहाँ स्वयं के मेटी
आन के बनव चाहलों
लोक बनैत रहल ,अहाँ मिटैत रहलों
ई की अहाँक त्याग नै थीक माँ ?
------हम चौंकी उठलों ..अहाँ के छी
कत स बाजि रहल छी ??
माँ - हम अहांक कोखि में छी
अहाँ हमरा नहि चिन्हलों..
हम अहींक गर्भ स बाजि रहल छी
अहाँ चोंकि किएक गेलों
अहींक तं प्रतिकृति छी हम \
हमर दादा दादी स डरा गेलों माँ
फेर बेटिय भेल के दंस स तिलमिला गेलों
घाह घाह भेल अहांक अंतर
हम देखने छी ...किन्तु,
अहाँ हमरा नष्ट नहि करब माँ
हम अहांक हिस्सा छी
अहांक अपूर्ण कामनाक पूर्णता छी
हम जनैत छी
हमर माँ नै कान्तिह
बाबु उदास नै हेताह
एखनही त एकटा माय बाबु
अपन विकलांग बेटी के योग्य बना देलनि
बेटी की होयत छैक जमाना के देखा देलनि
अहांक विहुँसैत चेहरा हमर ताकत बनत
हम आबि रहल छी माँ
अहाँ जत जत हारलों
अपन आन में उन जकां ओझरेलों
हम ओते ओते जीती के देखा देब
सबटा सम्बन्ध सोझरा लेब
हम आबि रहल छी माँ ....................

ठप्पा


अहांक गाम कते अछ
प्रश्न सुनतही अकचका गेलों हम
कनिक काल सोचैत ---
हमर गाम ??
उयेह ने जाहि ठाम अपन घर होयत छैक ?
हं हं उयेह घर ,उयेह गाम !
हमरा ते दू टा गाम अछ ..
एकटा जते से हम आयल छी
दोसर हम जते एलहुं अछ
मुदा, एहि में हमर कोन अछ
हम नै बूझैत छी जते स हम एलों
ओते स सनेस बारि द हमरा विदा
क देल गेल 'जाह अपन घर बेटी'
जाहि ठाम आयल छी ओहिठाम सब
सनेस बारी बिल्हल गेल
'कनियाक गाम से आयल छैक'
हम की जाने गेलों हमर गाम कोन थीक
हमरा नाम पर ते कत्तो किछ नै
भरल पुरल घर में हमर अस्तित्व किछ नै
बस 'फलना गामवाली' बनि रही गेलों
जाहि ठाम स आयल छलों
ओहि गामक ठप्पा बनल रही गेलों............

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